लेकिन इस बार यह गिरावट चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है। श्रद्धालुओं को कठिन परिस्थितियों में स्नान करना पड़ रहा है, जो न केवल उनकी आस्था को प्रभावित करता है, बल्कि यह एक गहरी पर्यावरणीय चेतावनी भी है।
मुख्य बिंदु:
सरयू का जलस्तर तेजी से घट रहा है — मात्र तीन दिनों में 8 सेंटीमीटर की गिरावट।
घाटों से मुख्य जलधारा दूर जा चुकी है, जिससे श्रद्धालुओं को रेत के टापू पार कर स्नान करना पड़ रहा है।
सहायक नदियों जैसे सियागुंठी का सूख जाना स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
यह न केवल धार्मिक गतिविधियों को प्रभावित करता है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र पर भी खतरा बनता जा रहा है।
समस्या के समाधान हेतु संभावित सुझाव:
1. जल प्रबंधन नीति: सहायक नदियों को पुनर्जीवित करने और वर्षा जल संचयन की व्यवस्था सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
2. नियमित जलसर्वेक्षण: जलस्तर की निगरानी और पूर्वानुमान प्रणाली को सशक्त बनाना चाहिए।
3. प्रशासनिक कदम: घाटों की सफाई, जलधारा को पुनर्स्थापित करने के प्रयास और जल संरक्षण अभियानों को सक्रिय किया जाना चाहिए।